मत्स्य पालन विभाग राजस्थान – Fisheries-Department-Rajasthan

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मत्स्य पालन विभाग राजस्थान

राजस्थान में मत्स्य पालन की सम्भावना ऐसे स्थानों पर अधिक संख्या में होती है जहाँ जैसे-तालाब, नदियाँ, झीले और बांध उपलब्ध होती है

राज्य में मत्स्य पालन के लिए कुल 15838 जल निकाय उपलब्ध है जिसको देखा जाये तो लगभग 4,23,765 हेक्टेयर क्षेत्रफल को कवर करती है

मत्स्य पालन विभाग राजस्थान की सम्भावनाएँ

“मत्स्य पालन विभाग राजस्थान” राजस्थान में मत्स्य उद्योग का राजनैतिक, सांस्कृतिक व आर्थिक पहलुओं में अपना विशेष स्थान बनता जा रहा है राज्य सरकार द्वारा मछली पालन उद्योग के विकास के लिए बहुत से प्रयास किए जा रहे है इन प्रयासों से विगत दशकों में इसका व्यापक विस्तार हुआ है ग्रामीण क्षेत्र में मछली पालन के प्रति कृषि व पशुपालन के समान, इसकी ओर लोगों का रुझान बढ़ा है |

“मत्स्य पालन विभाग राजस्थान” राजस्थान में मत्स्य पालन हेतु आधुनिक तकनीक एवं अच्छी उपलब्धता हेतु कई योजनाएँ तथा प्रशिक्षण केन्द्र स्थापित है इसमें मत्स्य प्रसार कार्यकर्ता, राजकीय प्रशिक्षण विधालय, ग्रामीण मत्स्य कृषक प्रतिक्षण, मत्स्यकी महाविद्यालय व विकास कार्यक्रमों मत्स्य पालन विकास अभिकरणों और मत्स्य क्षेत्र में काम कर रहे और सरकारी संगठनो की आवश्यकता को भी सम्मिलित किया गया है |

मछली पालन विषय की जानकारी हेतु आधुनिक संचार के साधन कम्प्यूटर, लेपटाप, स्मार्ट फोन के द्वारा एवं इंटरनेट के माध्यम से अन्य विषयों की तरह मत्स्यपालन विषय से सम्बंधित अनेक प्रकार की जानकारी हमारी इस वेबसाइट पर उपलब्ध है |

“मत्स्य पालन विभाग राजस्थान” राजस्थान राज्य भौगोलिक दृष्टि से देश में बड़ा राज्य है राजस्थान में जल की उपलब्धि चाहे वह सतही जल हो या भू-जल वर्षा पर ही निर्भर करती है भीतरी भागों से निकले नदी नाले,पहाड़ी क्षेत्र के ढलान, जल तीव्रता, मैदानी क्षेत्र, शुष्क व रेतीला क्षेत्र, मौसम परिवर्तन, कम आद्रता व उच्च तापमान इत्यादि प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष कई कारण है

जिनमे जल स्रोत वर्षा के पश्चात् सूख जाते है पूरे वर्ष के लिए जल की जरूरत को पूरा करने के उद्देश्य से संगृहित किया गया सतही जल ही राज्य में मत्स्य संसाधनो में वृद्धि करता है |

“मत्स्य पालन विभाग राजस्थान” राज्य में मत्स्य धन में स्थिरता व गुणवत्ता बनाये रखने में नदियों में आई बाढ़ महत्वपूर्ण भूमिका अदा करती है ये राज्य के भीतरी भागों तक मछलियों को पहुँचाने में प्रवजन-मार्ग और प्रजनन के लिए उचित दशाएँ उपलब्ध कराती है

इससे मत्वपूर्ण जलाशयों में मछली के स्वतः संचयन से उत्पादन में स्थिरता बनाये रखने में मदद मिलती है परन्तु इसमें 60 किस्म की मछलियाँ ही व्यापारिक महत्व की है बहुगुण की कतला, रोहू, नरेन, बाराँ आदि मछलियाँ प्रचुरता से मिलती है |

आमतौर पर राज्य के प्रत्येक जल क्षेत्र में मछलियाँ मिल जाती है परन्तु इसकी उपलब्धता में मात्रात्मक व गुणात्मक परिवर्तन आते रहते है |

“मत्स्य पालन विभाग राजस्थान” राजस्थान राज्य में मछली पालन के जल क्षेत्रों की संख्या 15838 है जलाशय, बड़े बाँध, छोटे-बड़े, मध्यम तालाबों के द्वारा कुल मछली पालन हेतु जलयुक्त क्षेत्रफल 4,23,765 हेक्टेयर क्षेत्रफल उपलब्ध है

“मत्स्य पालन विभाग राजस्थान” सन् 2010-11 में औसत मछली उत्पादन 28200 टन था जो पिछले 8 वर्षो के दौरान 12.2 प्रतिशत वार्षिक दर से बढ़ा है जो राष्ट्रीय स्तर का 8 प्रतिशत था बड़े जलाशयों से 176 किलोग्राम/हैक्टेयर, छोटे,मध्यम जलाशयों एवं बड़े तालाबों से 286 किलोग्राम/हैक्टर, मध्यम तालाबों से 1125 किलोग्राम/हैक्टर, छोटे तालाबों से 1675 किलोग्राम/हैक्टर एवं जल प्राप्त तालाबों से 2050 किलोग्राम/हैक्टर औसत उत्पादन हुआ |

“मत्स्य पालन विभाग राजस्थान” राजस्थान सरकार द्वारा 1982 में मत्स्य विभाग की स्थापना की गई थी इसमें मत्स्य क्षेत्रों का संरक्षण भी इसी विभाग द्वारा किया जाता है तथा राजस्थान मत्स्य नियम भी बने और उन्ही के अनुरूप, योजनाओं का निर्माण किया जा रहा है |

“मत्स्य पालन विभाग राजस्थान” पाँचवी पंचवर्षीय योजना में जिला स्तर पर मछली पालन क्षेत्र विकास के लिए आवश्यक निर्णय लिए गये जिसमें पायलेट प्रोजेक्ट सन् 1976 भीलवाड़ा में मत्स्य पालन विकास अभिकरण की स्थापना की गई

और इस प्रोजेक्ट की सफलता के फलस्वरूप वर्ष 1996-97 तक राज्य के 15 जिलों में केन्द्रीय प्रवर्तित योजना के अंतर्गत मत्स्य पालन विकास अभिकरण की स्थापना की गई तथा तत्तश्चात् इसमें विस्तार हो रहा है |

“मत्स्य पालन विभाग राजस्थान” राजस्थान में मत्स्य पालक विकास अभिकरण एक ऐसी संस्था है जो सिर्फ मछली पालन को प्रोत्साहन देने हेतु प्रशिक्षण व अनुदान सहायक देती है

जबकि जिला ग्रामीण बैंक राष्ट्रीय कृषि विकास बैंक और सहकारी बैंक ऐसी संस्थाएँ है जो अनेक कार्य के लिए दी जाने वाली सहायता में मछली पालन भी शामिल है इसके अतिरिक्त मत्स्य पालन विकास अभिकरण, मत्स्य कृषक प्रशिक्षण,निवेश, पोखरों का जीर्णोद्धार, नवीन पोखर निर्माण पर सहायता देता है व कृषकों को अनुदान भी मिलता है |

“मत्स्य पालन विभाग राजस्थान” राजस्थान जनजाति क्षेत्रीय विकास संघ लि.योजना से राजस्थान के दक्षिणी भागों के जिलों डूंगरपुर, बाँसवाड़ा, उदयपुर, सिरोही, चितौड़गढ़, कोटा आदि में मछलीपालन ने अच्छी प्रगति की है |

मत्स्य पालन in हिन्दी

राजस्थान में मछली का बीज कहाँ मिलता है

“मत्स्य पालन विभाग राजस्थान” मत्स्य पालन विभाग राजस्थान ने मछली बीज उत्पादन केन्द्र क्रमशः कोटा, रावतभाटा, भीलवाड़ा, बाँसवाड़ा, अलवर जिलों में तथा निजी उत्पादक चौधरी केंद्र हनुमानगढ़ व छतीसगढ़ से मछली बीज प्राप्त किया जा सकता है |

मछली बीज की उपलब्धता हेतु राज्य में 28 सरकारी बीज खेत है परन्तु अधिकतर जल की कमी एवं इनकी संरचना का सही ढंग से नही होने से कार्यात्मक रूप में नही है |

खाद्य मछलियों का वर्गीकरण

मच्छी पालन योजना

देखा जाये तो इस योजना का उद्देश्य देश में मछली पालन योजना को बढ़ावा देना है इसके अंतर्गत मछली की गुणवता, उत्पादकता आदि जैसी चीजो को मजबूताई देना होता है जबकि केन्द्र सरकारे देश के किसानों की आय बढ़ाने के लिए की योजनाएँ चला रही है |

राजस्थान मत्स्य अधिनियम

राजस्थान में मत्स्य पालन प्राचीनकाल से ही जैसे-तालाब, नदियाँ, झीले और बांध उपलब्ध के कान मत्स्य पालन किया जाता है राजस्थान राज्य में मछली पालन के जल क्षेत्रों की संख्या 15838 है जलाशय, बड़े बाँध, छोटे-बड़े, मध्यम तालाबों के द्वारा कुल मछली पालन हेतु जलयुक्त क्षेत्रफल 4,23,765 हेक्टेयर क्षेत्रफल उपलब्ध है |

मधुमक्खी पालन

मछली पालन लोन राजस्थान

मत्स्य पालन को बढ़ावा देने के लिए इस राज्य में ऐसे कई सरकारी बैंक है जो तालाब सुधार के लिए 75-80 हजार रूपये देती है तथा निजी भूमि पर नये तालाब के लिए 3-4 लाख का लोन देती है

राजस्थान में कार्यात्मक बीज खेत अथवा हेचरिया

  • मत्स्य पालन कॉलेज, उदयपुर
  • चौहान मछली हेचरी, हनुमानगढ़
  • आर.टी.ए.डी.सी.एफ हेचरी, जयसमन्द, उदयपुर
  • गावड़ी बीज खेत, भीलवाड़ा
  • काशीमपुर राष्ट्रीय बीज खेत, कोटा
  • रावतभाटा बीज खेत, कोटा
  • सूर सागर, कोटा

अर्द्ध कार्यात्मक हेचरिज

  • भीमपुर राष्ट्रीय बीज खेत, बाँसवाड़ा
  • सिल्जेड बीज खेत, अलवर
दीमक का वर्गीकरण

मत्स्य पालन का महत्व

मत्स्य पालन का महत्व निम्न प्रकारों से है

(1) भोजन के रूप में :-

मछली का मांस पूर्ण प्रोटीन है जिसमे सभी अमीनों अम्ल पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध रहते है इसमें वसा कम एवं खनिज लवण विटामिन A एवं डी तथा आयोडीन समद्व मात्रा में होता है

मछली प्रोटीन का पाचन व अवशोषण वनस्पति प्रोटीन की अपेक्षा अधिक आसानी से होता है अत यह बच्चो, गर्भवती महिलाओं एवं माताओं तथा लम्बी बीमारी से ठीक हुए रोगियों के लिए ठीक रहता है |

(2) मछली का तेल :-

इसको मछलियों के यकृत से प्राप्त किया जाता है जिसका औषधीय मूल्य होता है एवं इसमें विटामिन A प्रर्याप्त मात्रा में होता है मुख्य रूप से कांड लिवर और शार्क लिवर तेल को प्रयुक्त किया जाता है |

(3) मत्स्य चूर्ण :-

इसको मछलियों के अभक्ष्य भाग से बनाया जाता है जो इसमें 70% होता है तथा इन्हें प्राणी आहार में सम्पूरक की तरह अच्छे गुणों वाली प्रोटीन के रूप में उपयोग में लाते है अत मत्स्य चूर्ण अप्रत्यक्ष रूप से मानव पोषण से सम्बंधित है क्योंकि इन्हें पालतू जानवरों को खिलाया जाता है तथा बाद में प्राणियों को या उत्पादकों को मनुष्य अपने उपयोग में लेता है |

(4) मछली की खाद :-

तेल निकालने के बाद मछली के कचरे का उपयोग उर्वरक के रूप में किया जाता है जिसे सान्द्रिता जीवांश खाद भी कहते है |

(5) सौन्दर्यक मूल्य :-

छोटे आकार की मछलियों को जलजीवशाला में सुशोभित किया जाता है उदाहरण सोन मछली, परी मछली, मेन्क्रोफोस, ट्राइक्सास्टर |

(6) मच्छरों के नियन्त्रण के लिए :-

बहुत सी लार्वा भक्षी मछलियाँ मच्छरों के लार्वा को खाकर उनका नियन्त्रण करती है उदाहरण गम्बुसीया, पेनकस, हेप्लोकाइट्स, ट्राकोगेस्टर नामक लार्वा भक्षी मछलियाँ |

(7) वैज्ञानिक मूल्य :-

कुछ फेफड़ो वाली मछलियों का असंतोषजनक वितरण एवं उनकी शरीर रचना का जीव विज्ञान की दृष्टि से वैज्ञानिक महत्व है |

(8) रोजगार :-

तालाबों में मत्स्य पालन एवं मछली पकड़ने का उद्द्योग विकास एवं रोजगार के अधिक अवसर प्रदान करता है |

(9) आय का स्रोत :-

यह उद्द्योग किसानों के लिए आय का स्रोत साबित हुआ है इससे राष्ट्रीय आय भी बढ़ी है मछली उत्पादन की बढ़ोतरी को नीली क्रान्ति नाम दिया गया है |

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