Kenchua-केंचुए की संरचना

Kenchua(केंचुआ) केंचुआ वर्षा के समय जमीन पर रेंगने वाला जीव है जो ओलिगोकिटा(oligokita)संघ का सदस्य है केंचुए( Kenchua) की बाह्य संरचना :- इनका शरीर बेलनाकार लम्बा,अगले सिरे पर नुकीला एवं पिछले सिरे से थोडा गोला …

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Kenchua(केंचुआ)

केंचुआ वर्षा के समय जमीन पर रेंगने वाला जीव है जो ओलिगोकिटा(oligokita)संघ का सदस्य है

केंचुआ की संरचना

केंचुए( Kenchua) की बाह्य संरचना :-

  • इनका शरीर बेलनाकार लम्बा,अगले सिरे पर नुकीला एवं पिछले सिरे से थोडा गोला होता है
  • यह द्विपाशर्वसममित कृमि है
  • केंचुए बरसात के दिनों में ताम्रवर्ण युक्त गीली मिट्टी में रेंगता नजर आता है
  • यह पूर्ण वयस्क कृमि लगभग 150 मिमी.लम्बा तथा 3 से 5 चौड़ा होता है
  • केंचुए का शरीर 100 से 120 खण्डों में बँटा रहता है
  • बाह्य संरचना में सिर का अभाव होता है मुख्य शरीर के पहले खण्ड पर पाया जाता है जो देखने में अर्धचन्द्राकार होता है
  • सिर के सामने एक मांसल प्रवर्ध लटकता है जिसको प्रोस्टोमियम कहते है
  • पहला खण्ड जिसमे मुख घिरा रहता है उसे परितुंड कहते है
  • शरीर के अंतिम खण्ड पर नलद्वार अथवा गुदा होता है इसलिए इसे गुदाखण्ड कहते है
  • वयस्क केंचुए में 14वें 15वें 16वें खण्ड एक दुसे से मिल जाते है और एक मोटी पट्टी बनाते है जिसको क्लाइटेलम कहते है
  • इसकी दीवार में ग्रन्थियाँ भी होती है जो विशेष प्रकार के रस पैदा करती है इसी रस से खण्डों की रक्षा के लिए कोकून बनते है
  • 5वें एवं 6वें, 6वें एवं 7वें, 7वें एवं 8वें , 8वें एवं 9वें के बीच वाली अन्तखंडीय खानों में अलग अलग छोटे-छोटे छेड़ होते है जिनको शुक्रधानी रन्ध्र कहते है
  • 14वें खण्ड में एक छोटा सा मादा जननछिद्र होता है ओर 18वें खण्ड के अधर पाशर्व में नर जनन छिद्रों का जोड़ा होता है
  • शरीर के प्रथम, अंतिम व क्लाइटेलम खण्डो को छोड़कर समस्त खण्डो में S आकार के शूक पाये जाते है जो प्रत्येक खण्ड के मध्य में स्थित उपकला गर्त में धसे रहते है शुक छोटे बाल के समान संरचना होती है जो फैल या सिकुड़ सकती है तथा गति में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करती है
  • जनन अंकुरक के अन्तर्गत दो जोड़ी बिम्बरूपी उभार होते है जिनमे से एक जोड़ी पैपिलो 17वें खण्ड तथा दूसरी जोड़ी 19वें खण्ड में अधर सतह पर होती है
  • प्रत्येक पैपिली के शिखर पर प्याले के समान एक छिछला एवं चिपचिपा गर्त होता है जो मैथुन के समय चूषक का कार्य करता है

केंचुआ(Kenchua) की आंतरिक संरचना

(1)केंचुए(kenchua)में श्वसन तंत्र :-

  • केंचुए(kenchua)में श्वसन तंत्र नही पाया जाता है श्वसन नम त्वचा द्वारा होता है
  • ऑक्सीजन त्वचा के देहगुहीय द्रव में घुल कर रक्त की कोशिकाओं द्वारा ग्रहण कर लि जाती है इसी प्रकार कार्बनडाई ऑक्साइड का भी रक्त प्लाज्मा में घुलने के पश्चात् बाहर त्याग कर दिया जाता है
  • इसके रुधिर की प्लाज्मा में घुली अवस्था में हीमोग्लोबिन पाया जाता है जिसके द्वारा ऑक्सीजन शरीर के विभिन्न उत्तको तक पहुचती है

(2)केंचुए(kenchua)में परिसंचरण तंत्र :-

  • परिसंचरण तंत्र बंद प्रकार का अर्थात रक्त भित्तियुक्त नलिकाओं में बहता है
  • इसके रक्त में लाल रक्तकणिकाओ का अभाव होता है हीमोग्लोबिन प्लाज्मा में घुला रहने के कारण रक्त का रंग लाल होता है
  • ह्दय चार जोड़ी नलिकाकार आकार में पेशीय,स्पन्दनशील व कपाट युक्त होते है जो 7वें, 9वें, 12वें एवं 13वें खण्ड में पाये जाते है

(3)केंचुए(kenchua)में उत्सर्जन तंत्र :-

  • केंचुए(kenchua)उत्सर्जन तंत्र को नेफ्रीडीयल तंत्र कहते है शरीर के प्रथम तीन खण्डों को छोडकर शेष सभी खण्डो में प्रत्येक खण्डो के भाग में नेफ्रीडीया के सभी भाग स्थित होते है
  • नेफ्रीडीया उत्सर्जन करने वाले सूक्ष्म नलिकाओं का समूह होता है जिसमे सीधी पाली एवं कुण्डलित पाली प्रकार की नलिकाएँ होती है
  • कार्य के आधार पर नेफ्रीडीया को दो भागों में बाँट सकते है (1)बहिर्मुखी नेफ्रीडीया अर्थात जो सीधे शरीर के बाहरी भागों में खुल कर उत्सर्जन करते है (2)आंत्रमुखी नेफ्रीडीया जो सीधे आहार नाल में खुलते है
  • आहार नाल में उत्सर्जित होने वाले पदार्थो में उपस्थित जल की मात्रा का अवशोषण होने से केंचुआ अपनी शरीर की नमी को बनाये रखते है

(4)केंचुए(kenchua)में तंत्रिका तंत्र :-

केंचुए(kenchua) में सुविकसित व खण्डित तंत्रिका तंत्र पाया जाता है जिसके तीन भाग होते है

(1)केन्द्रीय तंत्रिका तंत्र :-इसमें एक अग्र तंत्रिका वलय एवं एक अधर तंत्रिका रज्जु होते है

(2)परिधीय तंत्रिका तंत्र :-तंत्रिका वलय अधर तंत्रिका रज्जु से निकलने वाली तंत्रिकाएँ परिधीय तंत्रिका तंत्र का निर्माण करती है इस से प्रमस्तिष्क गुच्छिका के पाशर्व से 8 से 10 जोड़ी तंत्रिकाएँ निकल के देहभित्ति, प्रोस्टोमियम, मुखगुहा व ग्रसनी को जाती है

(3)अनुकम्पी तंत्रिका तंत्र :-अनुकम्पी तंत्रिका तंत्र जालिका के रूप में होता है जो मांसपेशियों के अंदर व् आहार नाल तक फैला होता है

(5)केंचुए(kenchua)में जनन तंत्र :-

  • केंचुआ द्विलिंगी अथवा उभयलिंगी जन्तु है फिर भी इसमें लैंगिक जनन पाया जाता है क्योंकि केंचुए में पुंपूर्वता अवस्था पायी जाती है अर्थात नर जननांगो का विकास मादा जननांगो से पूर्व होता है
  • नर जननांगो के अंतर्गत वृषण, वृषणकोष, शुक्राशय, प्रोस्टेट एवं सहायक ग्रन्थियाँ होती है एवं मादा जननांगो के अंतर्गत अण्डाशय, अण्डकीप, अण्ड वाहिनियाँ, मादा जनन छिद्र एवं शुक्रग्राहिका होती है
  • केंचुए में मैथुनक्रिया भूमि के अंदर अथवा वर्षा ऋतु की नम व शांत रात्रि में एक घण्टे के लगभग होती है जिसमे दो केंचुए अधर सतह से इस प्रकार मिलते है उनके सिरे एक दूसरे के विपरीत दिशा में हो जाते है इस प्रकार से दोनों केंचुए के नर जनन छिद्र एक दूसरे के शुक्रग्राहिका छिद्रों के सामने आ जाते है तत्पश्चात नर जनन छिद्र उभरकर अंकुर के समान होने के पश्चात शुक्र द्रव तथा प्रोस्टेट द्रव का आदान प्रदान हो जाने के पश्चात इसे शुक्रग्राहिकाओ में संगृहीन कर लिया जाता है
  • इसमें कोकून का निर्माण क्लाइटेलम द्वारा होता है कोकून में ही निषेचन क्रिया सम्पन्न होने के कारण केंचुए का निषेचन बाह्य प्रकार का होता है एक कोकून से एक ही केंचुए का निर्माण होता है kenchua कोकून का निर्माण तब तक करता रहता है जब तक शुक्रग्राहिका से शुक्राणु समाप्त नही हो जाते है

(6)केंचुए(kenchua)में पाचन तंत्र :-

केंचुए(kenchua) का पाचन तंत्र शरीर की पूरी लम्बाई में फैला होता है जो मुख से शुरू होकर गुदा तक जाकर खत्म होता है जिसके निम्न भाग होत्र है

(1)मुख :-यह प्रथम खण्ड पर स्थित होता है जो देखने में अर्धचन्द्राकार छिद्र के रूप में होता है परितुण्ड कहलाता है जो भोजन का प्रवेशद्वार यही होता है

(2)मुखगुहा :-यह मुख से शुरू होकर तीसरे खण्ड तक होता है इसमें अनुदेधर्य वलय पाए जाते है मुखगुहा भोजन को ग्रहण करते समय यह अंदर बाहर होती है एवं भोजन को ग्रसनी में पहुँचाती है

(3)ग्रसनी :- यह चौथे खण्ड में स्थित होती है इसमें संयोजी उत्तको एवं पेशी तंतुओं का पुंजनुमा बना हुआ जाल होता है जिसमे लार ग्रन्थियाँ पाई जाती है इन लार ग्रन्थियों की लार में श्लेष्मा एवं प्रोटीन को अपघटन करने वाले एन्जाइम होते है

(4)ग्रसिका :- यह पांचवें से आठवें खण्ड तक फैली होती है इसमें किसी भी प्रकार के भोजन का पाचन नही होता है यह भोजन को ग्रसनी से पेषणी तक पहुँचाती है

(5)पेषणी :- यह आठवें एवं नवें खण्ड के मध्य अण्डाकार आकार में होता है यह पेशीय तंतुओं की गोठदार रचना होती है जो भोजन की पीसने का कार्य करती है

(7)आमाशय :-पेषणी के पश्चात् का भाग जो छोटी सँकरी नलीनुमा 9वें खण्ड से 14वें खण्ड तक फैला होता है आमाशय कहलाती है आमाशय की भीतरी सतह में अनेक वलन होती है इसकी भित्ति में कैल्सीफेरस ग्रन्थियाँ पाई जाती है जो मिट्टी के ह्युमिक अम्ल को उदासीन करती है

(8)आंत्र :-यह आमाशय से अधिक चौड़ी नलिका होती है जो 15वें खण्ड से शुरू होकर अंतिम खण्ड तक फैली होती है इसे निम्न तीन भागों में विभक्त किया जाता है

(अ)पूर्व टिफलोसोलर क्षेत्र :- यह 15वें खण्ड से 26वें खण्ड के बीच स्थित होती है इसके आन्तरिक भित्ति में छोटे-छोटे रसाकुर पाये जाते है जो भोजन का अवशोषण करते है इसमें 26वें खण्ड पर एक जोड़ी पाशर्वी शंकु उभार पाये जाते है जिसे आंत्र सीका कहते है जिसका अग्रस्थ सिरा बन्द होता है एवं ये 22वें या 23वें खण्ड तक फैले होते है

(ब)टिफलोसोलर क्षेत्र :-यह 27वें खण्ड से अंतिम 23 से 25 खण्ड को छोड़कर शेष खण्डों में होता है जिसे आंत्रवलन या टिफलोसोल कहते है इसमें रसांकुर आकार में बड़े होते है जिससे भोजन के अवशोषण की सतह बढ़ जाती है

(स)पश्य टिफलोसोलर क्षेत्र :-यह 23वें खण्ड से 25वें खण्ड तक फैला होता है जिसे मालाशय भी कहते है इसकी भित्तियां पतली होती है एवं इस भाग में टिफलोसोल नही होता है यह क्षेत्र गुदा द्वारा बाहर खुलता है

(9)गुदा :-गुदा अथवा मलद्वार यह शरीर के आखिरी खण्ड के पश्य छोर पर खुलता है जिससे अपचित भोजन के पदार्थ व मिट्टी के कण छोटी-छोटी गोलियों के रूप में बाहर निकलते है जिसे कृमि कास्टिंग्स कहते है

केंचुए(kenchua)की पाचन क्रिया

  • मिट्टी के कणों के साथ कार्बनिक पदार्थो को मुख गुहा से खीचने के पश्यात भोजन ग्रसनी में पहुँचाती है ग्रसनी की लार में म्युसिन भोजन को नम एवं प्रोटिएस नामक एंजाइम प्रोटीन का पाचन करने के लिए स्रावित होता है
  • जब भोजन ग्रसनी से होता हुआ पेषणी में पहुँचता है तब पेषणी द्वारा भोजन को महीन करने के लिए इसको पीसा जाता है तत्पश्चात भोजन आमाशय में पहुंचने पर आमाशय की भित्ति की केलसीफेरस ग्रन्थियाँ ह्युमिक अम्ल को उदासीन कर देती है अन्त में भोजन के आंत्र में पहुँचने पर आंत्रभित्ति से पाचक रस ट्रिपसीन, पेप्सीन, लाइपेज का स्रवण होने से वसा, प्रोटीन व स्टार्च का पाचन हो जाता है आंत्र में पाये जाने वाले रसांकुर व टिफलोसोल से भोजन के अवशोषण की क्षमता बढ़ जाती है इस प्रकार आंत्र में पाचन एवं अवशोषण दोनों प्रकार की क्रियाएँ होती है

केंचुआ खाद :-

वर्तमान में कार्बनिक पदार्थो के ढेर में कृत्रिम रूप से जीओफेगस प्रजाति के केंचुओं को पालकर उनसे जो कृमि कास्टिंग्स अर्थात केंचुओं से खाद प्राप्त की जानी वाली प्रकिया को वर्मीकल्चर कहा जाता है वर्मीकल्चर का चलन दिनों-दिन केंचुए(KENCHUA)महत्व को देखते हुए बढ़ रहा है

कम्पोस्ट खाद की तुलना में केंचुओं की खाद को श्रेष्ठ माना गया है क्योंकि कम्पोस्ट खाद से केंचुओं की खाद में नाइट्रोजन, फास्फोरस व पोटाश की प्रतिशत मात्रा ज्यादा होती है इसकी पाचन क्रिया द्वारा कार्बन का कार्बनडाई ऑक्साइड तथा नाइट्रोजन के जटिल यौगिक सरल यौगिक के रूप में बदल जाते है जिसके कारण मृदा में C:H अनुपात कम हो जाने से पौधों की जड़े आसानी से in तत्वों को पुनः ग्रहण कर लेती है

केंचुए(kenchua)खाद बनाने की विधि

केंचुए खाद एक श्रेष्ठ खाद है जो कृषि में लाभदायक होती है क्योंकि इसमें नाइट्रोजन, फास्फोरस व पोटाश की मात्रा ज्यादा होती है केंचुए की खाद तैयार करने के लिए आप गोबर की खाद के उपर पानी का छिडकाव देकर जैसे की वह नमी अवस्था में हो जाये उसके बाद केंचुए उस पर डालकर उसके बाद गोबर की एक परत और ढाल दे उस पर उसके बाद मिट्टी तथा पानी का छिड़काव दे 15 से 20 दिनों के अंदर केंचुए की खाद प्राप्त हो जाती है

केंचुए का वैज्ञानिक नाम

फेरेटिमा पोस्थुमा/लुम्ब्रिसिना(LUMBRICINA)

केंचुए खाद की कीमत

केंचुआ खाद तैयार करने के लिए कृषक को बहुत मेहनत करनी पडती है और प्रति किलो के खाद के लिए किसना का खर्चा 1.5 रूपये आता है जबकि किसान केंचुआ(kenchua) खाद ८ से 10 क्विंटल खाद लगभग 1250 रूपये में तैयार हो जाती है

केंचुआ(kenchua) पालन को क्या कहते है

ऐसी खाद जो किसानों के द्वारा केंचुए से जो खाद प्राप्त कि जाती है उसे वर्मी कम्पोस्ट कहते है

केंचुआ(kenchua) में भोजन को पीसने के लिए कौनसी रचना पाई जाती है

पेषणी :- यह आठवें एवं नवें खण्ड के मध्य अण्डाकार आकार में होता है यह पेशीय तंतुओं की गोठदार रचना होती है जो भोजन की पीसने का कार्य करती है

जाने केंचुआ(kenchua) में कितनी आँखे होती है

हम आज आप को बता दे कि वैज्ञानिको की खोज में केंचुआ के ना तो कोई आँखे पायी गई ना कोई कान पाये गये

conclusion

हम आशा करते है आज की इस पोस्ट में आपने केंचुए(kenchua)से सम्बंधित पूरी जानकारी इस पोस्ट से प्राप्त कि होगी

केंचुए तथा केंचुए की संरचना वाली पोस्ट आपको पसंद आयी हो तो अपने दोस्तों के साथ शेयर जरुर करे, धन्यवाद

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