plant pathology-पादप रोग विज्ञान

पादप रोग विज्ञान(plant pathology) पादप रोग विज्ञान, वनस्पति, कृषि विज्ञान या जीव विज्ञान की वह शाखा है जिसके अंतर्गत पादप रोगों के कारकों, रोगों से हुई हानि तथा उनके नियन्त्रण के उपायों का अध्ययन किया …

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पादप रोग विज्ञान(plant pathology)

पादप रोग विज्ञान, वनस्पति, कृषि विज्ञान या जीव विज्ञान की वह शाखा है जिसके अंतर्गत पादप रोगों के कारकों, रोगों से हुई हानि तथा उनके नियन्त्रण के उपायों का अध्ययन किया जाता है|

पादप रोग विज्ञान(plant pathology) का इतिहास :-

उन्नीसवीं शताब्दी से पादप रोग विज्ञान प्रारम्भ हुई मानी जाती है सन् 1845 में आयरलैण्ड में आलू की पछेती अंगमारी रोग की वजह से आलू की फसल होने से भयंकर अकाल पड़ा और भूख के कारण लगभग 12.5 लाख लोग मारे गये तथा 15 लाख लोग संयुक्त राज्य अमेरिका तथा अन्य देशों में गमन कर गये, इस अकाल को आयरिश दुर्भिक्ष के नाम से जाना जाता है |

आयरलैण्ड में आलू पादप में रोग होने के कारण पादप रोग विज्ञान का जन्म हुआ था फ्रांस में “अंगूर के मृदुरोमिल आसिता रोग” के संक्रमण की वजह से नष्ट हो रही अंगूर की फसल को बचाने हेतु सन् 1885 में प्रो. मिलार्ड़े ने “बोर्डो मिश्रण” की खोज की | यह नीला थोथा, चूना एवं पानी का निश्चित अनुपात में बनाया गया एक कवक व जीवाणुनाशक मिश्रण है |

चावल के भूरे पर्णचिति रोग द्वारा सन् 1943 में चावल की फसल नष्ट होने से भारत में भयंकर अकाल पड़ा जिसको “बंगाल का दुर्भिक्ष” कहा जाता है इस दुर्भिक्ष में लगभग 20 लाख लोग भूख से मारे गये | सन् 19४४ में वैक्समेन ने स्ट्रेप्टोमाइसिन एंटीबायोटिक की खोज की, जो पादप जीवाणु रोगों के नियन्त्रण हेतु बहुत लाभदायक रही है

सन् 1966 में प्रथम सर्वागी कवकनाशी कार्बोक्सीन की खोज श्मेलिंग एवं कुल्का ने की थी |

भारत में पादप रोग विज्ञान(plant pathology) का जनक

भारत में कवकों एवं उनसे उत्पन्न रोगों का अध्ययन ई.जे. बटलर ने किया जिसके कारण उनको “भारत में पादप रोग विज्ञान का जनक कहाँ जाता है |

पादप रोग विज्ञान में शब्द की उत्पत्ति ग्रीक भाषा के तीन शब्दों से मिलकर बना है (1)फाइटोन -पादप (2)पैथोज-रोग (3)लॉगोस-अध्ययन

पादप रोग विज्ञान(plant pathology)इस शाखा के अंतर्गत फसलों के प्रमुख रोगकारको का अध्ययन किया जाता है

कवक” “जीवाणु” “विषाणु

Terminology(शब्दावली)

शब्दावली में निम्न प्रकारों का अध्ययन किया जाता है |

रोगजनक :-

“रोग उत्पन्न करने वाले कारक को रोगजनक कहते है जैसे-जेन्थोमोनास जीवाणु

रोग :-

“रोग एक हानिकारक प्रक्रिया है जो निरन्तर उत्तेजना के कारण होता है जिसके परिणामस्वरूप कुछ पीड़ा उत्पन्न करने वाले लक्षण प्रकट होते है जैसे नींबू का कैंकर रोग

परजीवी :-

वह जीव, जो दूसरे जीव पर रहकर पोषण प्राप्त करता हुआ वृद्धि एवं गुणन करता है उसे परजीवी कहते है जैसे फाइटोप्लाज्मा

मृतजीवी :-

ऐसा जीव जो अपना पोषण मृत कार्बनिक पदार्थो से प्राप्त करता है उसे मृतजीवी कहते है जैसे -म्यूकर कारक

परपोषी :-

एक ऐसा जीव जो परपोषी को आश्रय देने वाला जीव अर्थात एक जीवित जीव, जिस पर परजीवी आक्रमण करता है और उससे वह अपना भोजन प्राप्त करता है उसे परपोषी कहते है

अतिवर्धन :-

परपोषी की कोशिकाओं की आकार में बढ़ोतरी के कारण होने वाली अत्यधिक वृद्धि को अतिवर्धन कहते है

परपोषी की कोशिकाओं के आकार में बढ़ोतरी के कारण होने वाली असाधारण वृद्धि को अतिवृद्धि कहते है

अतिवृद्धि :-

अविकल्पी परजीवी :-

ऐसा परजीवी जीव जो केवल अन्य जीवित जीव पर ही वृद्धि व गुणन करता है जैसे -एल्बूगो

ऊतकक्षय :-

कोशिकाओं तथा ऊतकों की मृत्यु होना ही ऊतकक्षय कहलाती है

हरिमाहीनता :-

पौधों के हरे भागों से पर्णहरित नष्ट होने के कारण पीला पड़ना हरिमाहीनता कहलाती है

संचरण :-

रोगजनक का एक पौधे से दूसरे पौधे में स्थानान्तरण होना संचरण कहलाता है जैसे-सफेद मक्खी द्वारा डाआ टमाटर के पर्ण कुंचन विषाणु का संचरण |

संक्रमण :-

पादप रोग विज्ञान(plant pathology) की इस शाखा में परपोषी में रोगजनक का स्थापित होना संक्रमण कहलाता है

लक्षण :-

एक रोग के कारण पौधे में होने वाली बाह्य एवं आंतरिक प्रतिक्रियाओं को रोग के लक्षण कहते है जैसे -हरिमाहीनता रोग

चिह्न :-

पादप रोग विज्ञान(plant pathology) की इस शाखा में पौधे के रोगग्रस्त भागों पर दिखाई देने वाला रोगजनक को रोग चिह्न कहते है जैसे -छाछ्या रोग

निवेश -द्रव्य :-

रोगजनक का वह भाग जो परपोषी पौधे के सम्पर्क में आता है तथा संक्रमण स्थापित करने योग्य होता है उसे निवेश-द्रव्य कहते है

वाहक :-

वह प्राणी जो रोगजनक को एक स्थान से दूसरे स्थान पर संचारित करता है उसे रोगवाहक कहते है जैसे-सफेद मक्खी

पाण्डुरता :-

प्रकाश के अभाव या अन्धकार की वजह से पौधों का पीला पड़ना पाण्डुरता कहलाता है

एकान्तर परपोषी :-

दो अलग-अलग जातियों के परपोषी पौधों में से वह एक पौधा, जो कुछ कवकों का जीवन चक्र पूरा करने के लिए आवश्यक होता है उसे एकान्तर परपोषी कहते है

कवकनाशी :-

plant pathology की इस शाखा में कोई भी पदार्थ जो कवक के लिए विषैला हो तथा कवक को मारने में सक्षम हो उसे कवकनाशी कहते है जैसे-मैन्कोजेब

पेथोवर :-

जीवाणु की रोगजनक जाति का एक उप-विभाजन, जो केवल पौधे की एक निश्चित जाति या वंश को ही संक्रमित कर सकता है जैसे -सिट्राई केवल सिट्रस को ही संक्रमित कर सकता है

रोगचक्र :-

पौधे में रोग विकास में सम्मिलित घटनाओं का क्रम, जिसमे रोगजनक के विकास की विभिन्न अवस्थाएँ तथा परपोषी पर पड़ने वाला विपरीत प्रभाव शामिल है

सर्वागी :-

ऐसा रसायन जो अंदर ही अंदर पौधे के शरीर में फैलता है उसे सर्वागी कहते है जैसे-विषाणु रोगकारक एवं कार्बेन्डाजिम कवकनाशी |

प्रतिजैविक :-

प्रतिजैविक पादप रोग विज्ञान(plant pathology) की इस शाखा में एक सूक्ष्मजीव द्वारा उत्पन्न रासायनिक पदार्थ जो दूसरे सूक्ष्मजीवो के लिए हानिकारक होता है जैसे-पेनिसिलिन

फाइलोडी :-

पुष्पीय भागों का पत्ती-सदृश संरचना में रूपांतरण को फाइलोडी कहते है जैसे-तिल का फाइलोडी रोग |

conclusion

हम आशा करते है आज कि इस पोस्ट में आपने plant pathology से सम्बंधित कुछ जानकारी प्राप्त किया होगा अगर पोस्ट अच्छी लगी को शेयर जरुर करे |

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2 thoughts on “plant pathology-पादप रोग विज्ञान”

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